एपीए मीडिया प्रा. लि के सीईओ अनूप गंगवार ने बताया है कि बीते 09 से 18 फरवरी के बीच कई वैवाहिक कार्यक्रम अटेंड किए। इस दौरान मैंने देखा शादियों में फ़िज़ूलखर्ची चरम पर पहुँच चुकी है… पहले यह सिर्फ बड़े बड़े शहरों और बड़े लोगों तक सीमित थी लेकिन आज मिडल और लोवर क्लास भी इससे अछूता नही हैं। पहले एक मंडप/पंडाल में वरमाला से लेकर शादी सब हो जाता था फिर अलग अलग स्टेज का खर्च बढ़ा.. अब तो हल्दी और मेहंदी में भी स्टेज खर्च बढ़ गया।

अनूप गंगवार अपनी शादी को याद करते हुए कहा कि मेरी शादी वर्ष 2008 में हुई थी तब से अब तक ही वैवाहिक कार्यक्रमों में कई नई चीजें को मिल रही हैं। वाक़ई अब की शादियाँ हैरान कर देने वाली हैं। यह फिजूलखर्ची अब सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है। इसमें कमी लाने की जरूरत है, नहीं तो बेटी के पिता का बोझ बढ़ता जाएगा, बेटी पैदा होना श्राप समझा जाएगा, भ्रूड हत्याएं बढ़ेंगी। शादी के बाद अब तो रिसेप्शन का भी क्रेज तेजी से बढ़ चुका है। ऐसा नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे/सोचेंगे का डर बना रहता है?
अनूप गंगवार ने कहा कि एक न एक दिन हमको-अपको यह अन्न, धन और समय की बर्बादी रोकनी होगी। जितना हो सके और जितना जल्दी हो सके रोकिये। दिखावे और चमक-दमक में फंसे बच्चों को भी समझाइए। कई बार उनको ही चाहिए होते हैं ये सब ढकोसले। पहले प्री वेडिंग शूट, डेस्टिनेशन वेडिंग, महंगा लहंगा/शेरवानी, उसके बाद हल्दी/मेहंदी के लिए अलग से थीम पार्टी। बेचारे रिश्तेदारों के पास पैसे हो न हो लेकिन इन थीम्स में उसी थीम के कपड़े पहन के आना है नही तो एल्बम खराब हो जायेगा। सच मे यार.. बहुत हो रहा है.. इसे रोकने की कोशिश करिये!









