कुर्मी मुख्यमंत्री अभियान समिति की लखनऊ महापंचायत में गूंजा राजनीतिक एकता का संदेश, शबनम लता बोलीं— बिहार की तरह यूपी में भी एकजुट होकर हासिल करनी होगी सत्ता में हिस्सेदारी
1994 की ऐतिहासिक कुर्मी चेतना महारैली की विरासत लेकर लखनऊ पहुंचीं मुख्य अतिथि शबनम लता , रैली के संयोजक सतीश कुमार सिंह की बेटी ने समाज को दिया संगठन और राजनीतिक एकजुटता का संदेश। महापंचायत में तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कुर्मी नेतृत्व और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर नई चर्चा।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व, राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व का सवाल एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इसी क्रम में 2 नवंबर 2026 को राजधानी लखनऊ के विश्वेश्वरैया सभागार में कुर्मी मुख्यमंत्री अभियान समिति, उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित कुर्मी महापंचायत ने समाज के राजनीतिक भविष्य और संगठनात्मक एकता को लेकर व्यापक विमर्श का मंच तैयार किया। महापंचायत में बिहार की 1994 की ऐतिहासिक कुर्मी चेतना महारैली का संदर्भ भी प्रमुखता से सामने आया।
इस आयोजन की खास बात यह रही कि 1994 में बिहार के पटना स्थित गांधी मैदान में आयोजित कुर्मी चेतना महारैली के संयोजक सतीश कुमार सिंह की बेटी शबनम लता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। उनकी उपस्थिति ने लखनऊ की महापंचायत को बिहार के उस ऐतिहासिक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन से जोड़ दिया, जिसने उस समय कुर्मी समाज की राजनीतिक चेतना, हिस्सेदारी और नेतृत्व के सवाल को व्यापक पहचान दिलाई थी।
महापंचायत में शबनम लता ने बिहार के अनुभव का उल्लेख करते हुए उत्तर प्रदेश के कुर्मी समाज को भी एकजुट होकर अपनी राजनीतिक शक्ति और नेतृत्व की भागीदारी मजबूत करने का संदेश दिया। उन्होंने बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी संगठित सामाजिक प्रयासों के माध्यम से सत्ता में प्रभावी हिस्सेदारी हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया।
इस दौरान समाज के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखा गया कि जब राजनीतिक रूप से सक्रिय समाज के लोग अलग-अलग दलों और संगठनों में मौजूद हैं, तो क्या वे अपने साझा सामाजिक हितों के लिए एक मंच पर आकर संवाद नहीं कर सकते?

1994 की कुर्मी चेतना महारैली: बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण पड़ाव
बिहार की राजनीति में 12 फरवरी 1994 का दिन कुर्मी समाज की राजनीतिक चेतना के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में कुर्मी चेतना महारैली का आयोजन हुआ था। इस रैली के संयोजन में तत्कालीन विधायक सतीश कुमार सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
उस समय बिहार की राजनीति सामाजिक न्याय, मंडल आंदोलन और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी के सवालों से गुजर रही थी। राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर विभिन्न पिछड़े समुदायों के भीतर भी नई राजनीतिक चेतना विकसित हो रही थी।
इसी पृष्ठभूमि में कुर्मी चेतना महारैली आयोजित हुई। इसका चर्चित संदेश था— “भीख नहीं, हिस्सेदारी चाहिए।”
इस नारे ने समाज के भीतर राजनीतिक भागीदारी और निर्णय प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व की मांग को एक स्पष्ट अभिव्यक्ति दी।
रैली में नीतीश कुमार की मौजूदगी भी उस समय राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रही। बाद के वर्षों में नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के प्रमुख नेताओं में उभरे और वर्ष 2005 में पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।
हालांकि बिहार की राजनीति में उनके उभार के पीछे अनेक राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण रहे, लेकिन 1994 की कुर्मी चेतना महारैली को सामाजिक गोलबंदी और राजनीतिक हिस्सेदारी के विमर्श का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
यही ऐतिहासिक संदर्भ 2 नवंबर 2026 को लखनऊ की महापंचायत में भी चर्चा का विषय बना।
सतीश कुमार सिंह की विरासत का लखनऊ में उल्लेख, शबनम लता ने दिया एकजुटता का संदेश
लखनऊ की कुर्मी महापंचायत में शबनम लता की मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति को आयोजन का महत्वपूर्ण पक्ष माना गया। 1994 की कुर्मी चेतना महारैली के संयोजक सतीश कुमार सिंह की बेटी होने के नाते उनका इस मंच पर पहुंचना उस ऐतिहासिक आंदोलन की स्मृति और वर्तमान सामाजिक विमर्श के बीच एक संबंध स्थापित करता है। उन्होंने बिहार के राजनीतिक अनुभव को सामने रखते हुए उत्तर प्रदेश के कुर्मी समाज से संगठित होने की अपील की। उनके संदेश का मूल भाव था कि समाज को अपनी सामाजिक और राजनीतिक शक्ति पहचाननी होगी तथा आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर सामूहिक हितों के लिए प्रयास करना होगा।
बिहार में सामाजिक गोलबंदी के बाद राजनीतिक नेतृत्व के उभार का उदाहरण देते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश में भी समाज को एकजुट होकर सत्ता में हिस्सेदारी के लिए प्रयास करने का संदेश दिया। महापंचायत में मौजूद लोगों के बीच इस बात पर चर्चा हुई कि सामाजिक एकता केवल नारों से नहीं आती। इसके लिए विभिन्न संगठनों के बीच भरोसा, संवाद, संगठनात्मक समन्वय और साझा उद्देश्य आवश्यक हैं।
लखनऊ महापंचायत में तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित
कुर्मी मुख्यमंत्री अभियान समिति द्वारा आयोजित महापंचायत में समाज की राजनीतिक दिशा और भविष्य की रणनीति को लेकर विचार-विमर्श किया गया। इसके बाद तीन प्रमुख प्रस्ताव पारित किए गए।
पहला प्रस्ताव: उत्तर प्रदेश के कुर्मी राजनीतिक दलों का एकीकरण
महापंचायत में प्रस्ताव पारित किया गया कि उत्तर प्रदेश में सक्रिय कुर्मी राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को समाज के व्यापक हित में एक साझा मंच पर आने का प्रयास करना चाहिए। अपना दल (एस), अपना दल (कमेरावादी), जनहित संकल्प पार्टी सहित विभिन्न राजनीतिक मंचों पर सक्रिय समाज के प्रतिनिधियों के बीच संवाद और समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। इस प्रस्ताव के पीछे विचार यह है कि राजनीतिक विचारधाराओं में अंतर होने के बावजूद शिक्षा, रोजगार, किसान हित, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर साझा विमर्श संभव है। समाज के सामने यह सवाल भी रखा गया कि यदि अलग-अलग राजनीतिक मंचों पर समाज की ताकत दिखाई देती है, तो क्या इस ताकत को साझा सामाजिक हितों के लिए भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता?
दूसरा प्रस्ताव: उत्तर प्रदेश में कुर्मी मुख्यमंत्री की मांग
महापंचायत का दूसरा प्रमुख प्रस्ताव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर कुर्मी समाज के प्रतिनिधित्व की मांग से जुड़ा रहा। कुर्मी मुख्यमंत्री अभियान समिति का कहना है कि प्रदेश की राजनीति में समाज की भागीदारी केवल चुनावी समर्थन और जनप्रतिनिधियों की संख्या तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मुख्यमंत्री पद सहित प्रदेश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व में प्रतिनिधित्व का सवाल भी लोकतांत्रिक चर्चा का विषय होना चाहिए। इस प्रस्ताव के माध्यम से राजनीतिक दलों के सामने यह मुद्दा रखने का प्रयास किया गया कि वे सामाजिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व में भागीदारी को लेकर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करें। समिति की ओर से इस मांग को किसी अन्य समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक हिस्सेदारी की आकांक्षा के रूप में प्रस्तुत किया गया।
तीसरा प्रस्ताव: समाज के हितों के प्रति जवाबदेही और लोकतांत्रिक असहमति
महापंचायत में पारित तीसरा प्रस्ताव समाज की एकता और सामूहिक हितों के प्रति राजनीतिक एवं सामाजिक नेतृत्व की जवाबदेही से संबंधित रहा। प्रस्ताव के अनुसार, जो नेतृत्व समाज के व्यापक हितों, एकीकरण और सामूहिक प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रयासों का समर्थन नहीं करता, उसके प्रति लोकतांत्रिक तरीके से असहमति दर्ज कराई जाएगी। इसका उद्देश्य व्यक्तिगत विरोध के बजाय सामाजिक मुद्दों पर जवाबदेही सुनिश्चित करना और समाज के भीतर लोकतांत्रिक संवाद को प्रोत्साहित करना बताया गया। आयोजकों के अनुसार तीनों प्रस्ताव समाज के भविष्य की दिशा तय करने और विभिन्न संगठनों को साझा विमर्श के लिए आमंत्रित करने के उद्देश्य से पारित किए गए।
तीन सभाएं, तीन नेता, एक समाज काश ! मुट्ठी बंद होती
लखनऊ की महापंचायत के आसपास समाज के अलग-अलग राजनीतिक मंचों पर आयोजित सभाओं और उनमें उमड़ी भागीदारी ने एक नई बहस को जन्म दिया है।अपना दल (एस), जनहित संकल्प पार्टी और अपना दल (कमेरावादी) जैसे अलग-अलग राजनीतिक मंचों पर समाज के लोग सक्रिय हैं। प्रत्येक संगठन की अपनी राजनीतिक विचारधारा, नेतृत्व और कार्यशैली है। लेकिन इन अलग-अलग मंचों के बीच एक साझा सामाजिक पहचान भी मौजूद है। इसी संदर्भ में यह सवाल चर्चा में आया है— तीन सभाएं, तीन नेता, एक समाज… काश! मुट्ठी बंद होती। यह पंक्ति केवल राजनीतिक एकता की अपील नहीं, बल्कि समाज के सामने मौजूद संगठनात्मक चुनौती की ओर भी संकेत करती है। कुर्मी मुख्यमंत्री अभियान समिति का प्रयास है कि राजनीतिक विविधता के बावजूद सामाजिक मुद्दों पर संवाद और समन्वय की संभावनाएं विकसित की जाएं। समिति के अनुसार किसी एक दल में शामिल होना या किसी एक राजनीतिक विचारधारा को स्वीकार करना अनिवार्य नहीं है। लेकिन समाज के साझा मुद्दों पर एक-दूसरे से संवाद करना और सामूहिक हितों के लिए प्रयास करना संभव है।
उत्तर प्रदेश में कुर्मी मुख्यमंत्री अभियान क्यों जरूरी माना जा रहा है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी समाज की उपस्थिति विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में रही है। समाज के लोग कृषि, शिक्षा, व्यापार, सरकारी सेवाओं और सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री पद पर कुर्मी समाज के प्रतिनिधित्व का प्रश्न अभियान समिति द्वारा प्रमुखता से उठाया जा रहा है। समिति का मानना है कि राजनीतिक दलों में भागीदारी के साथ-साथ समाज को नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में भी अपनी भूमिका को लेकर विमर्श करना चाहिए।
यह अभियान किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल के समर्थन तक सीमित नहीं बताया जा रहा, बल्कि सामाजिक एकता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नेतृत्व की मांग को व्यापक स्तर पर उठाने की पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
मुख्यमंत्री पद की मांग के साथ शिक्षा, रोजगार और किसान हित भी महत्वपूर्ण
महापंचायत में उठे राजनीतिक नेतृत्व के सवाल के साथ समाज के सामने कई अन्य मुद्दे भी हैं।
युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार, किसानों को उचित मूल्य, कृषि लागत में कमी, सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, सामाजिक न्याय, महिलाओं की भागीदारी और ग्रामीण क्षेत्रों का विकास ऐसे विषय हैं जिन्हें किसी भी व्यापक सामाजिक एजेंडे में स्थान मिलना चाहिए।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग को इन मुद्दों से जोड़ना अभियान की दीर्घकालीन उपयोगिता के लिए महत्वपूर्ण होगा।
विशेष रूप से युवाओं की भागीदारी को लेकर यह चर्चा जरूरी है कि समाज के भीतर नए नेतृत्व को कैसे अवसर दिए जाएं और सामाजिक संगठनों को गांव, ब्लॉक, तहसील तथा जिला स्तर पर कैसे मजबूत बनाया जाए।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के सामने नया सवाल
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले विभिन्न सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी को लेकर चर्चाएं तेज होना स्वाभाविक है।
कुर्मी मुख्यमंत्री अभियान समिति की महापंचायत ने राजनीतिक दलों के सामने भी एक सवाल रखा है कि वे समाज की राजनीतिक आकांक्षाओं और नेतृत्व में भागीदारी को किस रूप में देखते हैं।
हालांकि महापंचायत में पारित प्रस्ताव किसी राजनीतिक दल की सहमति या समर्थन का प्रमाण नहीं हैं। इन प्रस्तावों पर अलग-अलग राजनीतिक संगठनों की प्रतिक्रिया और आगे की बातचीत ही बताएगी कि एकीकरण की पहल किस दिशा में बढ़ती है।
समाज के सामने भी चुनौती कम नहीं है। अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के बीच संवाद बनाए रखना, संगठनात्मक मतभेदों को दूर करना और साझा सामाजिक एजेंडा तैयार करना आसान काम नहीं होगा।
इसके लिए केवल बड़े आयोजनों की नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली संगठनात्मक गतिविधियों और सामाजिक संवाद की आवश्यकता होगी।
बिहार से उत्तर प्रदेश तक: क्या इतिहास से मिलेगी एकता की नई दिशा?
1994 की बिहार कुर्मी चेतना महारैली ने राजनीतिक हिस्सेदारी के सवाल को व्यापक पहचान दिलाई थी। 2026 की लखनऊ कुर्मी महापंचायत ने उसी व्यापक विमर्श को उत्तर प्रदेश में एक नए संदर्भ के साथ सामने रखा है।
एक ओर 1994 की रैली के संयोजक सतीश कुमार सिंह की बेटी शबनम लता ने मुख्य अतिथि के रूप में बिहार के अनुभव का संदेश दिया, वहीं दूसरी ओर महापंचायत में पारित तीन प्रस्तावों ने राजनीतिक एकीकरण और मुख्यमंत्री पद पर प्रतिनिधित्व की मांग को औपचारिक रूप से सामने रखा।
अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश के अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक संगठन इन प्रस्तावों पर संवाद करेंगे? क्या वे साझा सामाजिक मुद्दों पर एक साथ बैठने की पहल करेंगे? और क्या 2027 से पहले यह विमर्श एक व्यापक संगठनात्मक रूप ले पाएगा?
इन सवालों का जवाब आने वाला समय देगा।
फिलहाल लखनऊ की कुर्मी महापंचायत ने समाज के सामने एक ऐसी बहस रखी है, जिसमें इतिहास की स्मृति, वर्तमान की राजनीतिक आकांक्षा और भविष्य की संगठनात्मक चुनौती तीनों शामिल हैं। कुर्मी मुख्यमंत्री अभियान समिति के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती महापंचायत में पारित प्रस्तावों को केवल घोषणा तक सीमित न रखकर संवाद, संगठन और सामाजिक भागीदारी के माध्यम से आगे बढ़ाने की होगी। इस अभियान समिति के संयोजक पटेल अभिषेक चौधरी पेशे से बरिष्ठ पत्रकार है।












